Tuesday, May 21, 2019

Food

A wonderful serenity has taken possession of my entire soul, like these sweet mornings of spring which I enjoy with my whole heart.

कृषि कालेज के परिसर में विशेषज्ञ किसानों के वैज्ञानिकों के बीच खेती से जुडे कई समसामयिक सवालों परर चर्चा

भोला पासवान शास्त्री कृषि कालेज के परिसर में इलाके के कुछ विशेषज्ञ किसानों और कालेज के कृषि वैज्ञानिकों के बीच खेती की चुनौतियों से जुडे कईसमसामयिक सवालों पर सीधी और जोरदार चर्चा आयोजित हुई । इस विशेष वाद.संवाद का सत्र स्थानीय किसानों और बुद्धिजीवियों की पहल पर कृषि कालेज केप्राचार्य डा पारसनाथ ने आयोजित कराया इस कृषि संवाद कार्यक्रम में अनुभवी किसानों और वैज्ञानिकों ने अपने अपने अनुभव और तर्क के आधार पर खेती से जुडेकई सवालों पर सकारात्मक चर्चा की और कृषि क्षेत्र की विविधताओं को सबने स्वीकार किया साथ हीं जैविक खेती बनाम रासायनिक खेती के सवालों पर भी सटीकजबाव एक दूसरे से हासिंल किये । भोलापासवान कृषि महाविद्यालय के चर्चा कक्ष में यह आयोजन अब तक के कृषि आयोजनों और संगोष्ठियों से अलग हटकर थाजहां अनुभवी किसानों के जमीनी अनुभव एक ओर सामने आ रहे थे तो दूसरी ओर कृषि वैज्ञानिकों के तकनीकी और वैज्ञानिक अनुभवों को सामने रखा जा रहा था ।चर्चा की शुरुआत करते हुए पूर्णिया और कटिहार जिले में कृषि का अनुभव रखने वाले प्रगतिशील किसान बीण्केण्ठाकुर ने कृषि के क्षेत्र की ज्वलंत समस्याओं कीगिनतियां कराई और बताया कि कई कारणों से आज की तारीख में जमीन की ऊपजाऊ ताकत का दोहन.शोषण किसान मजबूरन कर रहे हैं क्योंकि उनके सामनेकृषि उत्पादन और आमदनी बढाने की होड का जरुरी उलझन होता है । बीण्केण्ठाकुर ने जमीन की उर्वराशक्ति और अनाजों से आ रही मानव बीमारियों को दूररखने के लिए पारंपरिक खेती को उचित बताया पर उत्पादन की जरुरत को ही समस्या और उलझन भी करार दिया । पूर्णिया के रामनगर गांव के प्रगतिशील किसानऔर हिमकर मिश्रा ने चर्चा को आगे बढाते हुए कहा कि कोसी की बलुई और बंजर जमीन को शून्य जुताई के आधार पर पारंपरिक खेती के सहारे उपजाऊ बनायाजा सकता है । उन्होने रामनगर गांव में अपने एक बडे भूखंड पर चल रही ऋषि खेती जो मुख्यरुप से जैविक खेती ही है उसके लाभकारी और तकनीकी पक्षों पर चर्चाकी जिससे यह सामने आया कि जैविक खेती के सहारे जमीन की ऊर्वराशक्तिएबागवानी और औषधीय उत्पादन का काम सफलतापूर्वक किया जा सकता है पर यहांभी कृषि उत्पादन बढाने की चुनौती का पूरा समाधान नही मिलता। चर्चा के दौरान जैविक खेती के विशेषज्ञ संजय बनर्जी ने बताया कि जैविक खेती भले ही उत्पादनकी होड में शामिल नही हो सकती पर खेती की मूल प्रवृति और स्वास्थ्यवर्धक कृषि उत्पादन का आधार इसी में निहित है । उन्होने इलाके में दलहनी की घटती खेतीपर चिंता जताई और ऐसे दौर में उनके द्वारा अरहर की खेती किये जाने के सफल प्रयोग की जानकारी दी गयी । साहित्यकार चन्द्रशेखर मिश्र ने इस मौके पर कहाकि जैविक खेती बनाम रासायनिक खेती का

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​कृषि उपादान विक्रेताओं के लिए समेकित पोषक तत्व प्रबंधन विषय पर 15 दिवसीय सर्टिफिकेट

दिनांक 29 जनवरी 2019 को भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ में चलाये जा रहे कृषि उपादान विक्रेताओं के लिए समेकित पोषक तत्व प्रबंधन विषय पर 15 दिवसीय सर्टिफिकेट कोर्स हेतू प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रमाण पत्र वितरण एवं समापन समारोह के मुख्य अतिथि डाॅ॰ आर॰ के॰ सोहाने, निदेशक प्रसार शिक्षा एंव विशिष्ट अतिथि डाॅ॰आई॰ एस॰ सोलंकी, निदेशक, अनुसंधान, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर भागलपुर ने प्रशिक्षणार्थियों से फीड बैक लिया। इस दौरान प्रशिक्षणार्थियों ने कहा कि समेकित पोषक तत्वप्रबंधन के साथ साथ समेकित खरपतवार, कीट एवं पादप रोग नाशी विषयों को भी शामिल किया जाय ताकि हम सभी रहे कृषि उपादान विक्रेताओं को रासायनिक उर्वरकों के साथसाथ खरपतवार, कीट एवं पादप रोग नाशी दवाओं को विक्र्रय करने का लाईसेंस भी मिल सकेगा। तभी किसानों को एक ही दुकान से कृषि एवं कृषि से सम्बन्धित सभी तरह के कृषिउपादान उपलब्ध कराना संभव हो पायेगा। इस अवसर पर सह अधिष्ठाता-सह-प्राचार्य डा॰ पारसनाथ, के द्वारा फूलों का गुलदस्ता एवं अंगवस्त्र, के द्वारा मुख्य अतिथि डाॅ॰ आर॰ के॰सोहाने, निदेशक प्रसार शिक्षा एंव विशिष्ट अतिथि डाॅ॰ आई॰ एस॰ सोलंकी, निदेशक, अनुसंधान, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर भागलपुर को पुष्पगुच्छ एवं अंग वस्त्र देकरसम्मानित किया गया।डाॅ0 पारस नाथ, सह अधिष्ठाता-सह-प्राचार्य, भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ ने चल रहे प्रशि़क्षण कार्यक्रम के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदानकी। मुख्य अतिथि डाॅ॰ आर॰ के॰ सोहाने, निदेशक प्रसार शिक्षा ने अपने सम्बोधन में भारत वर्ष में प्रथम प्रशिक्षण के सफल आयोजन हेतु प्राचार्य एवं उनके टीम को बधाई देते हुएकहा कि भविष्य में कृषि उपादान बिक्रेताओं के साथ साथ कृषि उत्पाद बनाने वाली कम्पनियों का कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा जिससे किसानों, कृषि उत्पाद बिक्रेताओं एवंकम्पनियों के बीच माँग एवं आपूर्ति का बेहतर समन्वयन होगा और किसानों को गुणवत्ता युक्त कृषि उत्पाद ससमय उपलब्ध हो पायेगा। साथ ही साथ उन्होंने यह भी कहा कि समेकितपोषक तत्व प्रबंधन विषय पर जानकारी प्राप्त करने के बाद आप सभी की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि भारत सरकार के द्वारा बनाये गये नियम के अनुसार खाद एवं उर्वरक कासंतुलित प्रयोग करने हेतु किसानों को उचित सलाह प्रदान की जाय। तभी यह प्रशिक्षण सफल हो सकेगा। विशिष्ट अतिथि डाॅ॰ आई॰ एस॰ सोलंकी, निदेशक, अनुसंधान, बिहार कृषिविश्वविद्यालय, सबौर भागलपुर ने अपने सम्बोधन में समेकित पोषक तत्व प्रबंधन विषय पर 15 दिवसीय सर्टिफिकेट कोर्स अन्तर्गत प्रतिभागियों द्वारा प्रदान किये गये फीड बैक सेप्रसन्नता व्यक्त की तथा उन्होंने उनके उज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि आप सभी गुणवत्ता युक्त रासायनिक उर्वरक का ही विक्रय करें एवं किसानों को उचित सलाह देजिससे मृदा स्वास्थ्य हमेंशा के लिए खेती लायक उपयुक्त बना रहे। डा0 पंकज कुमार यादव, नोडल पदाधिकारी-सह-समन्वयक सहायक एंव प्राध्यापक-सह-कनीय वैज्ञानिक मृदाविज्ञान एवं कृषि रसायन विज्ञान विभाग द्वारा पूरे प्रशिक्षण की आख्या प्रस्तुत करते हुए विधिवत जानकारी प्रदान करते हुए बताया कि समेकित पोषक तत्व प्रबंधन विषय पर 15 दिवसीय सर्टिफिकेट कोर्स अन्तर्गत कृषि की आधुनिक तकनीक की जानकारी के लिए 15 दिनों तक बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की विभिन्न संस्थाओं के मृदा वैज्ञानिकों जैसेकृषि विज्ञान केन्द्र कटिहार, सिंचाई अनुसंधान केन्द्र अररिया, सिंचाई अनुसंधान केन्द्र मधेपुरा, जूट अनुसंधान केन्द्र कटिहार, बिहार कृषि महाविद्यालय, सबौर, डाॅ॰ कलाम कृषिमहाविद्यालय, किशनगंज एवं भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ के कुल 16 मृदा वैज्ञानिकों ने कुल 44 विषयों पर निर्धारित पाठ्यक्रम के अन्तर्गत सैद्धांतिक एवंप्रायोगिक प्रशिक्षण प्रदान किये। उन्होेने यह भी बताया कि एक्पोजर विजिट के लिए सभी प्रतिभागियों को दो दिनों तक बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की विभिन्न इकाइयों का भ्रमणभी कराया गया। जिसमें प्रमुख रुप से जैव उर्वरक उत्पादन ईकाई, एजोला, नील हरित शैवाल, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, मृदा परिक्षण प्रयोगशाला, टीशु कल्चर लैब आदि का भ्रमणकराकर विस्तार पूर्वक सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक जानकारी प्रदान की गई, जो प्रतिभागियों के लिए काफी लाभकारी रहा। डा0 पंकज कुमार यादव, नोडल पदाधिकारी-सह-समन्वयकने कहा कि यदि भविष्य के लिए हम सभी को स्वस्थ रहना है तो बिना जानकारी एवं मिट्टी जाँच के किसी भी प्रकार का रासायनिक पदार्थ एवं उर्वरक का प्रयोग मिट्टी में न करे, क्योंकिमिट्टी के स्वास्थ्य से ही हम सभी का स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध है। कार्यक्रम के समापन से पूर्व सभी प्रशिक्षणार्थियों की लिखित एवं मौखिक परीक्षा ली गई। परीक्षा के परिणाम केआधार पर सभी प्रतिभागियों को निर्णायक समिति द्वारा प्रमाण प्रदान करने की संस्तुति की गई। इस अवसर पर समेकित पोषक तत्व प्रबंधन विषय पर 15 दिवसीय सर्टिफिकेट कोर्स अन्तर्गत उपादान ं प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे प्रतिभागियों में क्रमशः समरेन्द्र शुधांशु, मो॰फैजान आलम, मो॰ इसमाइल आलम, शैलेन्द्र कुमार, अमर कुमार यादव, श्रवण कुमार, राहुल कुमार, अमित कुमार, मो॰ नाहिद अली, मो॰ सद्दाम हुसैन, सुमन कुमारी, रुबि कुमारी, निक्की कुमारी, दुर्गा कुमार, मुकेश कुमार आजाद, नीतीश कुमार, मो॰ इम्तियाज, मो॰ तौफीक आलम, दीपक कुमार आजाद, शिवजी चैधरी, रोहित राज, मो॰ सोहेल अहमद, अखिलेश्वर सिंह, मो॰ अब्दुल गफूर, मो॰ मनोवर आलम, मो॰ अब्दुल कयूम, बरूण कुमार, आशिष कुमार, जमाल उद्धीन, मो॰ आसिफ इकबाल आदि कुल 30 प्रशिक्षणार्थियों नेउत्साह पूर्वक प्रशिक्षण प्राप्त कर प्रमाण पत्र हासिल किया। इस कड़ी में सबसे अधिक प्रतिभागी 22 कटिहार, एक मधेपुरा, एक अररिया एवं 6 प्रतिभागी पूर्णियाँ जिले के विभिन्नप्रखण्डों से सम्मिलित हुए। इस अवसर पर महाविद्यालय के वैज्ञानिक डा॰ जनार्दन प्रसाद, डा॰ पंकज कुमार यादव, डा॰ अनिल कुमार, डा॰ रुबी साहा, डा॰ रवि केसरी, डाॅ॰ माचा उदय कुमार, श्री मणिभूषण,डाॅ॰ राधेश्याम, डाॅ॰ श्याम बाबू साह एवं कर्मचारियों आदि ने अपना सहयोग प्रदान किया। इस कार्यक्रम का संचालन डाॅ॰ अनिल कुमार एवं धन्यवाद डा॰ रुबी साहा, द्वारा किया गया।

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7 फ़ीसदी आबादी के राजनैतिक भागीदारी लिए एकजुट हुए कानू हलवाई

पटना।जैसे-जैसे बिहार में लोकसभा चुनाव नजदीक आते जा रहा है वैसे-वैसे जातियों की जमात गोलबंद होते जा रही है इसी...

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कृषि महाविद्यालय, में महिला किसान दिवस सह संरक्षित खेती विषयक परिचर्चा का आयोजन

भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ में दिनांक 15 अक्टूबर, 2018 को अन्तराष्ट्रीय मक्का एवं गेंहूँ अनुसंधान केन्द्र, मैक्सिको के द्वारा वित्त पोषित पूर्वीगंागेय क्षेत्र में मौसम अनुकूल टिकाऊ खेती (एस॰ आर॰ एफ॰ एस॰ आई॰) परियोजना के अन्तर्गत महिला किसान दिवस सह संरक्षित खेती विषयक परिचर्चा काआयोजन किया गया। कार्यक्रम में जिले के पाँच प्रखण्ड के महिला कृषक, कृषि वैज्ञानिक, छात्र-छात्राओं एवं कर्मचारियों ने भाग लिया। इस अवसर पर जीरो टीलेजतकनीक के द्वारा विभिन्न फसलों धान, गेहूँ, मक्का इत्यादि की खेती करने के लिए छः महिला किसानों को शाल देकर सम्मानित भी किया गया। कार्यक्रम काउद्घाटन करते हुए माननीय श्रीमति क्रांति सिंह, अध्यक्षा, जिला परिषद, पूर्णियाँ ने महिला कृषकों को आहवान किया कि खेती में नई तकनीक अपनाकर पशुधन एवंअन्य कृषि विधाओं को अपनाकर स्वावलंबी होने तथा अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करें। उन्होंने महिला कृषकों को एस॰ आर॰ एफ॰ एस॰ आई॰ परियोजना केअन्तर्गत नई तकनीक अपनाने तथा उनके प्रचार प्रसार करने मे उनके सक्रिय भूमिका के लिए सम्मानित किये जाने पर प्रसन्नता जाहिर की तथा महिला कृषकों केविशेष कार्यक्रम के आयोजन के लिए महाविद्यालय परिवार को बधाई दी। इस अवसर पर उन्होंने मृदा स्वास्थ्य की तरह स्वयं के स्वास्थ्य पर ध्यान देने की निवेदनकी। समारोह की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डा॰ पारसनाथ ने आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए महिला की कृषि मे भागीदारी की विस्तृत चर्चाकी तथा कहा कि सरकार ने महिला कृषक को सम्मानित करने के लिए इस तरह का आयोजन किया है। उन्होने नई तकनीक अपनाकर खेती करके फसलों कीउत्पादन तथा उत्पादकता को बढ़ा सकते हैं। डा॰ रणवीर कुमार, कनीय वैज्ञानिक (कृषि अर्थशास्त्र) ने विषय प्रवेश कराया तथा सिमिट द्वारा वित्त पोषित परियोजनाके अन्तर्गत किये जा रहे कार्यों एवं जीरो टीलेज प्रयोगों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने जीरो टीलेज को अधिक से अधिक अपनाकर खेती करने का अनुरोध किया।महिला कृषि वैज्ञानिकों में श्रीमती सुमन कल्याणी, सहायक प्राध्यापक (पौधा प्रजनन एवं अनुवंशिकी), श्रीमती अनुपम कुमारी सहायक प्राध्यापक (पौधा रोग) एवंश्रीमती रुबी साहा, सहायक प्राध्यापक (मृदा विज्ञान) ने अपने विचार व्यक्त किये तथा तकनीकी सत्र में कृषकों को प्रशिक्षित किया। धन्यवाद ज्ञापन डा॰ रणवीर कुमारतथा मंच संचालन सुुश्री प्रेरणा कुमारी एवं सुश्री रुमा भारती ने किया। कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में विभिन्न विषयों पर सम्बन्धित वैज्ञानिकों द्वारा चर्चा की गई तथाव्यवहारिक ज्ञान लाभ हेतु प्रक्षेत्र में लगे धान की सीधी बुआई के प्लाट पर जाकर सभी कृषकों को परिभ्रमण कराया तथा तुलनात्मक अध्ययन पर चर्चा की गई। प्रक्षेत्रभ्र्रमण में परियोजना के अनुसंधान सहायक डा॰ पवन कुमार श्रीवास्तव, प्रक्षेत्र तकनीशियन श्री नरेश कुमार यादव, श्री श्रवण कुमार, श्री मिट्ठू कुमार तथा श्री विकासकुमार ने सहयोग किया। इस अवसर पर कार्यक्रम के सफल संचालन में डा॰ जनार्दन प्रसाद

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राष्ट्रीय पोषण अभियान के तहत प्रखंड स्तरीय पोषण माह एवं मेला का आयोजन

कटोरिया बांका,आज दिनांक 25 सितम्बर को कटोरिया प्रखंड में राष्ट्रीय पोषण अभियान के तहत प्रखंड स्तरीय पोषण माह एवं मेला...

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मखाना उत्पादन एवं प्रसंस्करण तकनीक विषय पर पांच दिवसीय ;दरभंगा बिहार द्वारा प्रायोजित प्रषि़क्षण कार्यक्रम प्रारम्भ

आज दिनांकः 15-09-2018 को भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ बिहार के द्वारा पांच दिवसीय आत्मा,दरभंगा बिहार द्वारा प्रायोजित मखाना उत्पादनएवं प्रसंस्करण तकनीक विषय पर प्रशि़क्षण कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया। पांच दिवसीय कार्यक्रम का शुभारम्भ कृषि महाविद्यालय, पूर्णिया की स्नातक कृषि की छात्राओं केस्वागत गान के द्वारा किया गया। इस कार्यक्रम का संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर विधिवत उद्घाटन मुख्य अतिथि डाॅ0 पारस नाथ, सह अधिष्ठाता-सह-प्राचार्य,भोलापासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ एवं विशिष्ट अतिथि परियोजना निदेशक, आत्मा, पूर्णिया श्री सुधीर कुमार राय तथा उपस्थित किसानों, वैज्ञानिकों के द्वारा संयुक्तरूप से किया गया। अतिथितियों द्वारा प्रत्येक प्रशिक्षणार्थियों को बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर द्वारा प्रकाशित बिहार किसान डायरी-2018 प्रदान की गई -कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्य अतिथि एवं सभी मंचासीन आगत अथितियों का फूलों का गुलदस्ता प्रदान कर स्वागत किया गया। अपने स्वागत अभिभाषण मे डाॅ0 नाथ सहअधिष्ठाता-सह-प्राचार्य,भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ नेविगत सात वर्षों में कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ की उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी दिए जिसमेेंमहाविद्यालय में कृषि शिक्षा, शोध, प्रसार एवं प्रशिक्षण के साथ साथ अन्य गतिविधियों जैसे राष्ट्रीय सेवा योजना, एन सी सी, रेड रिबन क्लब, एण्टी ड्रग क्लब, साहित्यिक एवं वादविवाद परिषद्, हिन्दी चेदतना मास, स्वच्छता ही सेवा अभियान आदि के द्वारा किये गये कार्यों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया। मखाना पर अपने उद्बोधन में उन्होंने बताया किभविष्य में जल्द से जल्द कोशी क्षेत्र में मखाना कोरीडोर विकसित किया जाएगा, जिसके लिए मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डा॰ अनिल कुमार की टीम लगातार सर्वेक्षणका कार्य कर रही है। कोशी क्षेत्र में मखाना कोरीडोर विकसित करने में कृषि महाविद्यालय की अग्रणी भूमिका होगी। भारत सरकार द्वारा चलाये जा रहे कौशल विकास मिशन केपाठ्यक्रम में बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के प्रयास से मखाना विषय पर 240 घंटे का प्रशिक्षण कार्यक्रम को सम्मिलित करने का प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा गया, जिसका अनुमोदन हो गया है। इस अवसर पर दरभंगा के किसान श्री श्याम कुमार सहनी एवं श्री नरेश कुमार मुखिया ने मखाना कृषकों के समस्या पर चर्चा करते हुए मखाने कीउन्नत किस्मे, बीज की उपलब्धता, बोहराई यंत्र एवं लावा निकालने की मशीन के विकास की आवश्यकता के साथ साथ अन्य फसलों के तरह मखाना फसल को सरकारी अनुदान मेंशामील करने की बात रखी तथा उन्होने कहा कि मखाना फसल के साथ मछली पालन हम सभी किसानों के लिए काफी लाभकारी होगा किसानों को इस प्रकार का प्रशिक्षण समय-समय पर सरकार द्वारा मिलता रहे तो बिहार के सभी मखाना उत्पादक किसानों को लाभ मिलेगा। विशिष्ठ अतिथि परियोजना निदेशक, आत्मा, पूर्णिया श्री सुधीर कुमार राय नेअपने संबोधन में बताया कि कोशी क्षेत्र में मखाना की अपार संभावना है। मखाना किसानों के हेतु प्रशिक्षण आयोजित करना एक सराहनीय प्रयास है। उन्होंने बताया कि मखाना कीखेती में सबसे बड़ी समस्या खेत से मखाना बीज की बुहराई एवं बीज से लावा बनाना। जिसमे से एक समस्या के निदान हेतु मखाना आधुनिक प्रसंस्करण यंत्र की स्थापना कृषिमहाविद्यालय, पूर्णिया की जा चूकी है। आत्मा द्वारा संचालित किसानों की कल्याणकारी योजनाओं के बारे में विस्तार पूर्वक बताया साथ ही साथ मखाना उत्पादक संघ गठितकरने की सलाह दी। मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डा॰ अनिल कुमार ने सरकार द्वारा मखाना फसल क्षेत्र के विस्तार एवं सही तरिके से खेती की पद्धति में मछली कोसामिल कर के किसानों की आय को दुगना करना एक अच्छा माध्यम हो सकता है। उन्होने महाविद्यालय द्वारा विकसित मखाना की प्रजाती सबौर मखाना -1 का कोशी क्षेत्र केकिसानों के द्वारा अपनाकर पूरानी पद्धति से अधिक लाभ प्राप्त किया जा रहा है। यदि किसान तलाब पद्धति में मखाना के साथ मछली पालन को अपनाये तो अधिकाधिक लाभप्राप्त कर सकते है। तकनीकी सत्र मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डा॰ अनिल कुमार ने नकदी फसल के रूप में मखाना-सह- मछली की खेती: सम्भावना एवं महत्व विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि खासतौरपर बिहार में देश की आजादी के कई वर्षों बाद भी हमारे किसान भाई अपने हकों की रक्षा के लिए न तो जागरूक हो पाए और न ही संगठित, इसलिए वर्तमान प्रवेश में किसानों कोस्वयं जागरूक होकर विभिन्न कृषि के संस्थओं से योजनाओं एवं प्राप्त होने वाले लाभ को प्राप्त कर अपने समाजिक आर्थिक विकास की बात सोचने की जरूरत है। मखाना -सह- मछली पालन कर किसान एक ही समय में अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर सकते है। किसानों को अपने मखाना एवं मछली का अच्छा लाभ प्राप्त करने के लिए एक उद्यम के रूपअपनाने की आवश्यकता है। इसके लिए बिहार सरकार द्वारा बनों उद्धमि अभियान की शुरूआत की गई हैं। जिसमें सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी प्रदान की जारही है।मखाना -सह- मछली हेतु एक कम्पनी बनाकर अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है, जिसमें कम्पनी चलाने के लिए शेयर एवं शेयर धारकों का होना बहुत ही जरूरी है। हमसभी चाहते हैं कि बिचैलियों को हटाया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। हम सभी किसान बिचैलियों को अपना उत्पाद औने-पौने मूल्य पर विक्री कर देते हैं, लेकिन जब अपनेउत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त करने के लिए स्वयं को खड़े होने की बात आती है, तो पीछे हट जाते हैं अथवा अपने आपको असहाय महसूस करते हैं। उन्होंने किसानों की कम्पनी सेहोनेवाले लाभ के बारे बताया जो कि निम्नलिखित हैः- मखानाउत्पादक कम्पनी मखाना के साथ-साथ अन्य फसलों के लिए खाद, बीज, कीट एवं व्याधिनाशक रासायनिक दवाओं थोक दर उचित मूल्य पर उपलब्ध कराएगी जिससेउत्पादन लागत काफी कम होगा। महाविद्यालयके वैज्ञानिकों के दल के देख रेख में वैज्ञानिक तरीके से मखाना-सह- मछली उत्पादन पर सोध कार्य चल रहा है। कृषिउत्पाद के विक्रय हेतु नाबार्ड द्वारा देश के अन्य राज्यों में संचालित कृषक उत्पादक कम्पनी से जोड़ा जाएगा ताकि किसानों को उचित मूल्य प्राप्त हो सके साथ ही साथबिचैलियों की भागिदारी को समाप्त किया जा सके। मखानाबुहराई यंत्र से लेकर आधुनिक प्रसंस्करण इकाई की स्थापना, आदि लाभमखाना -सह- मछली पालन के बारे में पुराने लोगों में भ्रांतियाँ थी कि मखाना के साथ केवलकवई, गरई, देशी मांगुर एवं सिंघी मछली का उत्पादन हो सकता है। कतला, रेहु एवं मृगल (नैनी) का पालन मखाना के साथ नहीं हो सकता क्योंकि मखाना के पŸाों में काँटे होते हैतथा जब फसल अपने चरम पर होता है तो तलाब के पानी की ऊपरी सतह को पूर्णतः ढक देती है। विगत कई वर्षों के अथक अनुसंधान से मखाना -सह- मत्स्य पालन तकनीक विकसीत की गई है। तलाब क्षे़त्रफल का 1/10 भाग तालाब के बीच में बाँस के चार खुंटो केसहायता से खाली छोड़ा जाता है, जिसे रिफ्यूज क्षेत्र कहा जाता है। इस क्षेत्र में न तो मखाना का कोई पौधा होगा और न ही पŸाा होगा। कुल लागत 75 से 80 हजार रूपये प्रतिहैक्टेयर एवं शुद्ध लाभ 1 लाख 15 हजार रूपये प्राप्त कर सकते है। डाॅ0 पंकज कुमार यादव ने मखाना में पोषक तत्वों का प्रबंधन के साथ-साथकहा कि जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष में बदलते मौसम को ध्यान में रखते हुए मखाना के साथ मखानाआधारित विभिन्न फसलों के वार्षिक चक्र के बारे में बताया तथा कृषकों से कहा कि आपसभी सजग एवं सचेत रहकर फसलों का चयन करें साथ ही साथ कोशी क्षेत्र में अनुपयुक्तजलजमाव क्षेत्रों की उत्पादकता, लाभप्रदता में वृद्धि एवं टिकाऊ खेती के लिए मखाना उत्पादन की तकनीक का उचित उपयोग करें। मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पर विशेष जोर देते हुएकहा कि रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम से कम करें। किसी भी फसल को लगाने से पूर्व मिट्टी की जाँच कराना अत्यंत आवश्यक है, जिसके लिए भारत सरकार द्वारा सभीकिसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराने की योजना चलायी जा रही है। मिट्टी जाँच से पूर्व मृदा नमूना लेने की विधि एवं मिट्टी जांच की विस्तार पूर्वक चर्चा करते मिट्टी में घटतेकार्बन की मात्रा पर चिन्ता व्यक्त की तथा किसानों से अनुरोध किया की बिना मिट्टी जाँच के किसी भी प्रकार के रासायन का प्रयोग मिट्टी में ना करें। साथ ही साथ उन्होने बताया किढैचा एवं सनई की फसल को हरी खाद के रूप में, वर्मीकमपोस्ट(केचूआ खाद), जैविक खाद (गौबर की खाद) एवं जैव उर्वरक का अधिक से अधिक उपयोग करें जिससे आपसभी केखेतों में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा संतुलित हो सकें। दरभंगा के किसान श्री सुनील कुमार सहनी, राजन कुमार झा, श्रवण कुमार, हरदेव मुखिया, बिल्टु मुखिया, बुधन मुखिया, दिनेश मुखिया, रौदी मुखिया, कमलेश मुखिया आदि कुलबीस मखाना उत्पादक कृषकों ने उत्साह पूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर महाविद्यालय के अन्य वैज्ञानिक डा॰ जे॰ एन॰ श्रीवास्तव, डा॰ जनार्दन प्रसाद, डा॰ रवि केसरी, डाॅ0 तपन गोराई, श्री जय प्रकाश प्रसाद, श्रीमती अनुपम कुमारी, डा॰माचा उदय कुमार, ई0 मोहन सिन्हा एवं कर्मचारियों ने अपना सहयोग प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डा॰ अनिल कुमार ने तथाधन्यवाद ज्ञापन डाॅ0 पंकज कुमार यादव द्वारा किया गया।

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कृषि मंत्री डॉ प्रेम कुमार ने पूणियाॅ जिला के जलालागढ में किसान मेला – का उदघाटन किया

कृषि मंत्री ने कहा कि महीना में दो बार जनता दरबार लगेंगे जिला के प्रखंड स्तर तक किसानों की जो...

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उत्तर प्रदेश, केरल, तमिलनाडू, ओडिसा, महाराष्ट्रा, अरूणाचल प्रदेश एवं बिहार के वैज्ञानिकों ने सीखे मखाना उ

बिजिनेस इनक्यूवेशन एवं वैल्यू चैन इंटीग्रेशन फाॅर डबलिंग फारमर्स इनकम“ विषयक 21 दिवसीय समर स्कूल सह ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम के सभी प्रतिभागियोंद्वारा भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ के मखाना अनुसंधान ईकाई का भ्रमण किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा वित्तपोषित,निदेशक प्रसार शिक्षा डा0 आर0 के0 सोहाने के नेतृत्व में 21 दिवसीय समर स्कूल सह ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुरमें बिहार एवं देश के अन्य प्रदेशों में कार्यरत कृषि वैज्ञानिकों के ज्ञान के संवर्द्धन हेतु किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद््देश्य माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्रमोदी द्वारा निर्धारित लक्ष्य 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के उपलक्ष में आयोजित किया गया है। इस ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम में सात राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश,केरल, तमिलनाडू, ओडिसा, महाराष्ट्रा, अरूणाचल प्रदेश एवं बिहार के कुल 25 वैज्ञानिकों ने भाग लिया। इसी क्रम में जलीय खरपतवार से आच्छादित अनुपयुक्त एवं अनुत्पादकजलजमाव क्षेत्रों की उत्पादकता, लाभप्रदता में वृद्धि एवं टिकाऊ खेती की तकनीकी जानाकारी प्राप्त करने के लिए कुल 25 वैज्ञानिकों ने भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय,पूर्णियाँ के मखाना अनुसंधान ईकाई का भ्रमण किया। भ्रमण के दौरान सभी प्रतिभागी वैज्ञानिकों का स्वागत डाॅ0 पारस नाथ सह अधिष्ठाता-सह-प्राचार्य, भोला पासवान शास्त्रीकृषि महाविद्यालय, पूर्णियाँ ने किया साथ ही साथ विगत 6 वर्षों से मखाना अनुसंधान परियोजना की उपलब्धियों पर चर्चा करते बताया कि इस महाविद्यालय द्वार मखाना कीउन्नतशील प्रजाति सबौर मखान-1, मखाना उत्पादन तकनीक एवं कीट प्रबंधन तकनीक विकसित की गई है। प्रधान अन्वेषक मखाना अनुसंधान परियोजना डा0 अनिल कुमार नेमखाना आधारित फसल पद्धति से बिहार में जलीय खरपतवार से आच्छादित अनुपयुक्त एवं अनुत्पादक जलजमाव क्षेत्रों की उत्पादकता, लाभप्रदता में वृद्धि एवं टिकाऊ खेती केलिए अतिआवश्यक कार्यः इन क्षेत्रों की साफ-सफाई एवं जीर्नोद्धार करना, सोलर पम्प की व्यवस्था आदि के साथ-साथ मखाना आधारित वार्षिक फसल पद्धति के बारें में विस्तारपूर्वक बतायाः (क) जुलाई महीने में 1-2 फीट तक जलजमाव वाला क्षेत्र जो अक्टूबर में सुख जाता है। इन क्षेत्रों में किसान गरमा धान की खेती करते हैं, लेकिन इससे लाभ बहुत ही कम होता है।खेत पद्धति- मखाना आधारित टिकाऊ फसल पद्धति द्वारा मखाना उत्पादकों के जिवीकोपार्जन हेतु, सामाजिक एवं आर्थिक उन्नयन मखाना-सरसों फसल पद्धति से सबसे अधिकआय एवं लागत अनुपात ( 3.5ः1), प्राप्त होता है, इसके बाद क्रमषः मखाना-सिंघाड़ा, मखाना- धान- मसूर, मखाना- धान- केराव फसल पद्धति से प्रप्त होता है। मखाना- बरसीम,मखाना- धान- मटर, मखाना- धान- मसूर, मखाना- धान- तीसी, मखाना- धान- खेसारी, मखाना- धान- चना ,मखाना- धान- बांकला, मखाना- धान- केराव (ख) जुलाई महीने में 3-4 फीट तक जलजमाव वाला क्षेत्र जो जनवरी से फनवरी में सुख जाता है। तालाब पद्धति- मखाना आधारित टिकाऊ फसल पद्धति मखाना- सिंघाड़ा (ग) जुलाई महीने में 7-10 फीट तक जलजमाव वाला क्षेत्र जो सालों भर जलमग्न रहता है। तालाब पद्धति- मखाना आधारित टिकाऊ फसल पद्धति मखाना- सिंघाड़ा एवं मखाना-सह- मत्स्यपालन। डाॅ0 पंकज कुमार यादव ने मखाना पौधशाला से मुख्य खेत में मखाना के पौधों की रोपाई की वैज्ञानि विधी को विस्तार पूर्वक बताया। डा0 पारस नाथ ने बताया कि मखानाफसल में कीट प्रबंधन: खेत पद्धति- मखाना पौध की रोपाई से पूर्व इमिडाक्लोरपिड 70 ॅै अथवा थायोमेथोक्सैम 70 ॅै 5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर उसके जड़ को आधाघंटा तक उस घोल मे डुबोकर षोधित करना चाहिए तथा मखाना पौध की रोपाई के 40 दिनों बाद 5 प्रतिषत नीम तेल का घोल 25 दिनों के अन्तराल पड़ छिड़काव करना चाहिए ।तालाब पद्धति - मखाना पौध की रोपाई के 40 दिनों बाद 5 प्रतिषत नीम तेल का घोल 25 दिनों के अन्तराल पड़ छिड़काव करना चाहिए । इस अवसर पर मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश,केरल, तमिलनाडू, ओडिसा, महाराष्ट्रा, अरूणाचल प्रदेश एवं बिहार के कुल 25 वैज्ञानिकों जैसे डा0 धनंजय सिंह, डा0 योगेन्द्र सिंह, डा0 शैलेन्द्र सिंह, डा0 सचिदानंद प्रसाद, डा0 आलोक भारती, डा0 आर0 पी0 शर्मा, डा0 सचिदानंद सिंह, डा0 रजनीश मिश्रा, डा0 नितिन पाण्डेय एवं डा0 फूल कुमारी आदि के साथ अन्य वैज्ञानिकों ने भी भाग लिया। कार्यक्रमका संचालन प्रधान अन्वेषक मखाना अनुसंधान परियोजना डा0 अनिल कुमार तथा धन्यवाद ज्ञापन डाॅ पंकज कुमार यादव द्वारा किया गया।

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